जज,मजिस्ट्रेट और जस्टिस में अंतर

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जज,मजिस्ट्रेट और जस्टिस में अंतर

 

आज हम न्यायाधीश(जज), दण्डाधिकारी(मजिस्ट्रेट) एवम न्यायमूर्ति(जस्टिस) शब्दो में क्या अंतर हैं, उसके बारे में चर्चा करेंगे।
सबसे पहले हम भारत की न्याय पालिका पर चर्चा करेंगे।

भारतीय न्यायपालिका की इकहरी एवम एकीकृत न्याय व्यवस्था

विश्व के विभिन्न संघात्मक शासन प्रणालियों से भिन्न भारत मे इकहरी और एकीकृत(Unified & Integrated) न्याय पालिका है।इसे स्वतंत्र और निष्पक्ष(Free & Fair) बनाये रखने के लिए इसे व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के अनुचित दबाव से पृथक रखा गया है।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय को न्यायिक पुनरावलोकन (Court of Review) का अधिकार के कारण यह विश्व का सबसे शक्तिशाली न्यायपालिका माना जाता है।

 

सर्वोच्च/उच्चतम न्यायालय(Supreme Court)

सर्वोच्च/उच्चतम न्यायालय (Supreme Court)- भारत मे सबसे शिखर पर,भारत का अनन्तिम न्यायालय, सर्वोच्च या उच्चतम न्यायालय(Supreme Court) है।यहां के न्यायाधीश को न्यायमूर्ति(Justice) कहा जाता है।

 

उच्च न्यायालय (High Court)

उच्च न्यायालय (High Court)- संघात्मक शासन अंतर्गत इसके नीचे सभी प्रान्तों/इकाइयों/राज्य के लिए उच्च न्यायालय(High Court) की व्यवस्था की गई है,जो प्रत्येक राज्य या एक से अधिक राज्यो या केन्द्र-शासित प्रदेशों को मिलाकर व्यवस्था की गई है।भारत मे,वर्तमान में उच्च न्यायालयों की संख्या 25 है।


अधीनस्थ न्यायालय (Sub-ordinate Court)

अधीनस्थ न्यायालय (Sub-ordinate Court)- न्यायिक प्रशासन हेतु प्रत्येक राज्य को विभिन्न जिलों में विभाजित किया गया है।प्रत्येक जिले में तीन प्रकार के न्यायालय होते हैं।

1.व्यवहार न्यायालय(दीवानी/Civil Courts)-

चल या अचल संपत्ति से संबंधित प्रकरणों में विचारण किया जाता है।जिला स्तर पर सबसे बड़े न्यायालय को जिला न्यायालय कहते हैं।यहां का सबसे बड़ा अधिकारी, व्यवहार न्यायाधीश(District Judge) कहलाता है। इसके अन्तर्गत व्यवहार न्यायाधीश,मुंसिफ मजिस्ट्रेट आदि आते हैं।

2.आपराधिक न्यायालय(फौजदारी/Criminal Courts)-

राज्य में शांति व्यवस्था भंग करने अर्थात मारपीट,लड़ाई-झगड़े,चोरी,बलात्कार,हत्या आदि सम्बन्धी प्रकरणों पर विचरण किया जाता है।जिले के सबसे बड़े न्यायालय को जिला स्तर पर जिला सत्र न्यायालय कहलाता है,यहां के सर्वोच्च अधिकारी को जिला सत्र-न्यायाधीश (District Session Judge)कहतें हैं। इसके अन्तर्गत मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी(जिलाधीश/Collector),प्रथम एवम द्वितीय श्रेणी दण्डाधिकारी आते हैं।
जिला स्तर पर एक ही व्यक्ति,जिला सत्र न्यायाधीश और जिला न्यायाधीश होता है,जिस वह व्यवहार सम्बन्धी प्रकरण देखे,वह जिला न्यायाधीश कहलाता है और जब वह आपराधिक प्रकरण देखे तो वह जिला सत्र न्यायाधीश कहलाता है।

3.राजस्व न्यायालय(लगान/Revenue Courts)-

इसमें,भू-लगान सम्बन्धी प्रकरणों पर विचारण किया जाता है।राजस्व परिषद सबसे बड़ा न्यायालय है,इसके अंतर्गत आयुक्त,जिलाधीश,अनुविभागीय अधिकारी,तहसीलदार,नायब तहसीलदार आते हैं।
अब हम,जज,मजिस्ट्रेट और न्यायमूर्ति पर चर्चा करेंगे,अधिकांश लोग इन सभी शब्दो को पर्यायवाची समझते हैं,किन्तु इनका अर्थ अलग-अलग है-

1.न्यायाधीश(Judge)-

न्यायाधीश, पहले से निर्धारित विधि अनुसार अधिकार,अनुतोष और क्षतिपूर्ति की मांग पर विचारण करते हैं।
वे,न्याय का वह सार्वजनिक अधिकारी होते है,जिनका कर्तव्य है कि,वह विधि(कानून/Law) का परीक्षण और प्रतिपादन करे।यह निम्न न्यायालय(Lower Courts) में बैठते है।

2.दण्डाधिकारी(magistrate)-

दण्डाधिकारी,जब अपराध के लिए दण्ड की मांग पर विचारण करते हैं।
वे,एक ऐसे न्याय अधिकारी होते हैं,जो विधि को संचालित और क्रियान्वित(लागू) करने के सीमित अधिकार रखते हैं।जिनके कोर्ट में नागरिक और आपराधिक दोनो प्रकरण आते हैं।

3.न्यायमूर्ति(Justice)-

जो साक्षात न्याय की मूर्ति हो,जो न्याय की पीठ पर आसीन हों,पीठासीन या न्यायमूर्ति कहलाते हैं।
वे,जो निर्णय सुनाते हैं,वह विधि(कानून) बन जाता है।सभी निम्न न्यायालय इसका अनुकरण करते हैं।
अभी भी यदि अंतर समझ मे नही आया हो तो एक उदाहरण द्वारा इसे समझने का प्रयत्न करते हैं-
प्रकरण-एक व्यक्ति ने किसी की भूमि पर अनाधिकृत स्वामित्व(कब्जा) कर ले,तो पीड़ित पक्ष- तीन प्रकार की कार्यवाही करने की मांग कर सकता है-

1.अपने अधिकारों के लिए भूमि खाली करवाने की मांग
2.क्षतिपूर्ति या अनुतोष की मांग
3.अनाधिकृत स्वामित्व के विरुद्ध दण्ड की मांग।

विकल्प 1 एवम 2 व्यवहार(Civil) प्रकरण है,जिस पर न्याय, न्यायाधीश(Judge) करेंगे।
विकल्प 3 में दण्ड की मांग की गई है अतः यह आपराधिक प्रकरण है,जिस पर न्याय दण्डाधिकारी(Magistrate) करेंगे।
जब यह प्रकरण उच्च या उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचरण हेतु लाया जावेगा,तो इस पर न्याय न्यायमूर्ति(Justice) करेंगे,क्योंकि इनका निर्णय सभी अधीनस्थ न्यायालयों हेतु प्रवर्तनीय होगा,जो उद्धरण/दृष्टांत(नजीर/Rulings) कहलाता है और भविष्य के प्रकरणों के लिए विधि बन जाता है।

तो  यही  जज,मजिस्ट्रेट और जस्टिस में अंतर  कुछ जानकारी आपके साथ हम शेयर कर  रहे ,कृपया ऐसी और जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट को फॉलो करते रहे

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